Wednesday, February 8, 2023
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Main Issues Of Gujarat Elections This Time, A Review On It – गुजरात चुनाव: मुद्दा विहीन है इस बार का चुनाव, कौन मारेगा बाजी?


गुजरात चुनाव, शांत-शांत

गुजरात चुनाव, शांत-शांत
– फोटो : twitter

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गुजरात चुनाव में मतदान को दस दिन बाकी हैं और अभी तक चुनावी जोर दिख ही नहीं रहा। इसकी दो वजह हैं एक सबको मालूम है और एक आपको हम बताने जा रहे हैं।

तो जो ज्ञात वजह है वो है सबसे बड़े प्रचारकों की चुनाव से गैर-मौजूदगी। चुनावों की घोषणा के बाद से ना मोदी आए हैं और ना ही राहुल-सोनिया, वहीं जो दूसरी वजह है वो है कि मुद्दा बनाने में माहिर मानी जाने वाली बीजेपी को कोई मुद्दा बनाने को ही नहीं मिल रहा। जो भी थोड़ी बहुत गर्मी दिख रही है वो आम आदमी पार्टी के प्रचार की वजह से ही है। कांग्रेस को तो जैसे सांप सूंघा है वो न दिख रही है, न बोल रही है और छप भी सबसे कम रही है।

कांग्रेस ने साधी हुई है चुप्पी 

पांच साल पहले के चुनावों में लगभग सभी 182 सीटों पर अपना वोट बैंक साबित कर चुकी कांग्रेस के इस सन्नाटे-पूर्ण प्रचार से ना तो मोरबी पुल हादसे मुद्दा बनता दिख रहा है और ना ही बिल्किस बानो के अपराधियों की ‘बाइज़्ज़त’ रिहाई। हो सकता है कि कांग्रेस ने तय किया हो कि वो ‘हिंदुत्व की सबसे बड़ी प्रयोगशाला वाले गुजरात’ में हिंदू-मुस्लिम के बीजेपी के ट्रेप में फंसने से बच रही हो, लेकिन इससे क्या अल्पसंख्यक समाज में भरोसा आएगा कि वो जिस पार्टी के साथ सालों साल रहे वो कांग्रेस आज भी उसके साथ ही है?

कांग्रेस की इसी रणनीति का फायदा उठाने में आम आदमी पार्टी लगी है। शहरी मुस्लिम इलाकों में हर घर पहुंचकर वो ये साबित कर रही है कि कांग्रेस नहीं, आप ही आपका भला करेगी। शहरी इलाकों में गरीब और आम वर्ग में आप लोकप्रिय हुई है और उसकी लोकप्रियता का कारण फ्री वाला फार्मुला भी है, पानी फ्री, बिजली फ्री, पढाई फ्री, दवाई फ्री।

शहरों में जोर है, पर गांवों में मेहनत न के बराबर हुई है। आप इतने से दिलों के रास्ते ईवीएम में उतर पाएगी क्या?

चुनावी मुद्दा ढूंढे नहीं मिल रहा

वहीं बीजेपी का भी हाल ऐसा ही है, मुद्दा ढूंढे नहीं मिल रहा। राहुल-प्रियंका और सोनिया की गैर-मौजूदगी बीजेपी के कैंपेन में ईंधन नहीं डाल पा रही है। गाली दें तो किसे दें? राहुल का गुजरात दौरा इसलिए शायद नहीं हो रहा, क्योंकि राहुल आएंगे तो मोदी को घेरेंगे और बकौल मोदी, वो इन गालियों को ऊपर चढ़ने के लिए सीढ़ी बना लेंगे।

सोनिया का मोदी को बोला गया “मौत का सौदागर’ ने पूरा चुनाव बदल दिया था। पीएम मोदी प्रचार में अब जब आएंगे तो इसे जरूर याद दिलाएंगे।

कांग्रेस चुनाव को स्थानीय ही रखना चाहती है और बीजेपी इसलिए ही बैचेन है, क्योंकि पीएम मोदी तो चुनाव के बाद सीएम बनेंगे नहीं और मुख्यमंत्री भूपेन्द्र पटेल के नाम ऐसा फिलहाल कुछ है नहीं जिससे चुनाव जीता जा सके। बीजेपी अगर स्थानीय मसलों की बात करेगी या काम गिनाने पर आएगी तो जाहिर तौर पर 27 साल की राज्य की और 8 साल की केन्द्र की सत्ता विरोधी लहर का सामना करना होगा, मोरबी पर सफाई देनी होगी की अबतक अजंता कंपनी के मालिक जसूभाई पटेल की गिरफ़्तारी क्यों नहीं हुई? इसका भी जवाब जनता चाहेगी।

इसलिए चुनाव के ठीक पहले समान नागरिक संहिता जैसे राष्ट्रीय मुद्दे को बीजेपी ने उछाला है ताकि वोटों का धुर्वीकरण हो, राष्ट्रीय मुद्दे पर बहस हो और अपने हिंदूवादी वोट बैंक को साधा जाए। बीजेपी के पक्ष में भी यही जा रहा है अल्पसंख्यकों के वोट में कांग्रेस और आप में बंटवारा और बहुसंख्यक वोटों की लामबंदी।

इस बार पटेल, कडवा, लेउआ, अगड़े- पिछड़े, हिंदू-मुसलमान और भारत-पाकिस्तान… कुछ भी नहीं दिख रहा है। चुनाव नीरस और मुद्दा विहीन है। कुछ जिलों में त्रिकोणीय मुक़ाबले के बावजूद भी चुनाव बहुत दिलचस्प नहीं दिख रहा है।  राष्ट्रीय चैनलों पर आफताब और श्रद्धा का मुद्दा ज्यादा छाया हुआ है ना कि गुजरात की गहमागहमी।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें [email protected] पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

गुजरात चुनाव में मतदान को दस दिन बाकी हैं और अभी तक चुनावी जोर दिख ही नहीं रहा। इसकी दो वजह हैं एक सबको मालूम है और एक आपको हम बताने जा रहे हैं।

तो जो ज्ञात वजह है वो है सबसे बड़े प्रचारकों की चुनाव से गैर-मौजूदगी। चुनावों की घोषणा के बाद से ना मोदी आए हैं और ना ही राहुल-सोनिया, वहीं जो दूसरी वजह है वो है कि मुद्दा बनाने में माहिर मानी जाने वाली बीजेपी को कोई मुद्दा बनाने को ही नहीं मिल रहा। जो भी थोड़ी बहुत गर्मी दिख रही है वो आम आदमी पार्टी के प्रचार की वजह से ही है। कांग्रेस को तो जैसे सांप सूंघा है वो न दिख रही है, न बोल रही है और छप भी सबसे कम रही है।

कांग्रेस ने साधी हुई है चुप्पी 

पांच साल पहले के चुनावों में लगभग सभी 182 सीटों पर अपना वोट बैंक साबित कर चुकी कांग्रेस के इस सन्नाटे-पूर्ण प्रचार से ना तो मोरबी पुल हादसे मुद्दा बनता दिख रहा है और ना ही बिल्किस बानो के अपराधियों की ‘बाइज़्ज़त’ रिहाई। हो सकता है कि कांग्रेस ने तय किया हो कि वो ‘हिंदुत्व की सबसे बड़ी प्रयोगशाला वाले गुजरात’ में हिंदू-मुस्लिम के बीजेपी के ट्रेप में फंसने से बच रही हो, लेकिन इससे क्या अल्पसंख्यक समाज में भरोसा आएगा कि वो जिस पार्टी के साथ सालों साल रहे वो कांग्रेस आज भी उसके साथ ही है?

कांग्रेस की इसी रणनीति का फायदा उठाने में आम आदमी पार्टी लगी है। शहरी मुस्लिम इलाकों में हर घर पहुंचकर वो ये साबित कर रही है कि कांग्रेस नहीं, आप ही आपका भला करेगी। शहरी इलाकों में गरीब और आम वर्ग में आप लोकप्रिय हुई है और उसकी लोकप्रियता का कारण फ्री वाला फार्मुला भी है, पानी फ्री, बिजली फ्री, पढाई फ्री, दवाई फ्री।

शहरों में जोर है, पर गांवों में मेहनत न के बराबर हुई है। आप इतने से दिलों के रास्ते ईवीएम में उतर पाएगी क्या?

चुनावी मुद्दा ढूंढे नहीं मिल रहा

वहीं बीजेपी का भी हाल ऐसा ही है, मुद्दा ढूंढे नहीं मिल रहा। राहुल-प्रियंका और सोनिया की गैर-मौजूदगी बीजेपी के कैंपेन में ईंधन नहीं डाल पा रही है। गाली दें तो किसे दें? राहुल का गुजरात दौरा इसलिए शायद नहीं हो रहा, क्योंकि राहुल आएंगे तो मोदी को घेरेंगे और बकौल मोदी, वो इन गालियों को ऊपर चढ़ने के लिए सीढ़ी बना लेंगे।

सोनिया का मोदी को बोला गया “मौत का सौदागर’ ने पूरा चुनाव बदल दिया था। पीएम मोदी प्रचार में अब जब आएंगे तो इसे जरूर याद दिलाएंगे।

कांग्रेस चुनाव को स्थानीय ही रखना चाहती है और बीजेपी इसलिए ही बैचेन है, क्योंकि पीएम मोदी तो चुनाव के बाद सीएम बनेंगे नहीं और मुख्यमंत्री भूपेन्द्र पटेल के नाम ऐसा फिलहाल कुछ है नहीं जिससे चुनाव जीता जा सके। बीजेपी अगर स्थानीय मसलों की बात करेगी या काम गिनाने पर आएगी तो जाहिर तौर पर 27 साल की राज्य की और 8 साल की केन्द्र की सत्ता विरोधी लहर का सामना करना होगा, मोरबी पर सफाई देनी होगी की अबतक अजंता कंपनी के मालिक जसूभाई पटेल की गिरफ़्तारी क्यों नहीं हुई? इसका भी जवाब जनता चाहेगी।

इसलिए चुनाव के ठीक पहले समान नागरिक संहिता जैसे राष्ट्रीय मुद्दे को बीजेपी ने उछाला है ताकि वोटों का धुर्वीकरण हो, राष्ट्रीय मुद्दे पर बहस हो और अपने हिंदूवादी वोट बैंक को साधा जाए। बीजेपी के पक्ष में भी यही जा रहा है अल्पसंख्यकों के वोट में कांग्रेस और आप में बंटवारा और बहुसंख्यक वोटों की लामबंदी।

इस बार पटेल, कडवा, लेउआ, अगड़े- पिछड़े, हिंदू-मुसलमान और भारत-पाकिस्तान… कुछ भी नहीं दिख रहा है। चुनाव नीरस और मुद्दा विहीन है। कुछ जिलों में त्रिकोणीय मुक़ाबले के बावजूद भी चुनाव बहुत दिलचस्प नहीं दिख रहा है।  राष्ट्रीय चैनलों पर आफताब और श्रद्धा का मुद्दा ज्यादा छाया हुआ है ना कि गुजरात की गहमागहमी।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें [email protected] पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।





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